गुरुवार, 22 नवंबर 2012

डाक विभाग ने शुरू की मोबाइल मनी ट्रांसफर सेवा
डाकिया डाक लायापरKK Yadav - 15 घंटे पहले

भारतीय डाक विभाग (डीओपी) ने भारतीय संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के साथ मिलकर मोबाइल मनी ट्रांसफर सेवा शुरू की है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने 15 नवम्बर, 2012 बृहस्पतिवार को दिल्ली और केरल के बीच भारतीय डाक की इस सेवा को लांच किया। इस सेवा के जरिए कोई व्यक्ति डाकघरों में मोबाइल फोन के माध्यम से दूसरे व्यक्ति को तत्काल पैसे भेज सकेगा। इसके अंतर्गत, पैसे भेजने के लिए डाकघरों में डाक सहायक बीएसएनएल की ओर से उपलब्ध कराई गई तकनीक और मोबाइल फोन का इस्तेमाल करेंगे। पैसे भेजने और प्राप्त करने वाले दोनों के पास किसी भी टेलीकॉम कंपनी का मोबाइल नंबर होना आवश्यक है। 

सोमवार, 12 नवंबर 2012

एलियन द्वारा पृथ्वी लोक का अध्ययन

     एक एलियन मंच पर आया। तालियों की गड़गड़ाहट शुरू हो गयी। तालियों की गड़गड़ाहट थमने का नाम नहीं ले रहा था कि इसी बीच मंच पर मौजूद एलियन बोल पड़ा,‘हमारे ग्रह की प्यारी-प्यारी, भोली-भाली जनता सरकार ने आपकी खुशहाली के लिए नयी व्यवस्था की खोज में हमें दूसरे ग्रह पर भेजा था। हमने पूरे मनोयोग से अपने कत्र्तव्यों का निर्वहण किया है और आपके सामने उस अध्ययन का खुलासा कर रहे हैं, जो इस प्रकार है-
      जब हमने सुना कि पृथ्वीलोक में एक भारतभूमि भी है, जहाँ 33 करोड़़ देवी-देवता विराजते हैं। हमने सोचा कि जब इतने देवी-देवता वहाँ विराजते होंगे, तो वहाँ की जनता निश्चित रूप से बह्माण्ड के सारे ग्रहों से ज्यादा आनन्द और मस्ती में रहती होगी। सो हमने निर्णय किया कि पृथ्वीलोक की व्यवस्था और उनमें लगे लोगों का ही अध्ययन किया जाये, लेकिन जब हम भारत-भूमि पर उतरे, तो देखा कि यहाँ पर तो सब कझ्छ एक दम से उल्टा-पुल्टा है।
    हम ऐसी जगह गये जहाँ पर सारे लोग, विभिन्न ध्र्म-संप्रदायों के थे, विभिन्न संस्कृतियों के थे, कई-कई जातियों में बँटे हुए थे। उनका लालच, स्वार्थ और पैसे की भूख अंतहीन थी। घृणा, द्वेष और ईष्र्या तो जैसे लोगों में पैदाइशी हों। हमें और गहन अध्ययन करना था, पूछने पर हमें वहाँ बताया गया कि कचहरी परिसर में एक साथ सभी प्रकार के मनुष्यरूपी जीव मिल जायेंगे। हम कचरही परिसर में गये, जहाँ पर न्याय करने के लिए जज थे, पेशकार थे, वकील थे, मोवक्कील थे, पुलिस थी, चोर थे, पाकेटमार थे, झपटमार थे, पत्रकार वेश में बड़े-बड़े मक्कार थे, राजनीतिज्ञ ठग और गुण्डे थे, बड़ी-बड़ी दाढ़ी और गेरूआ वस्त्रों में पंडित और पुजारी थे, साधु बाबा आदि-आदि थे, जो किसी न किसी अपराध् में शामिल थे, बड़े-बड़े हाकिम थे, जिन्हें जनता की खुशहाली के लिए नियुक्ति की गयी थी, लेकिन यहाँ हमने देखा कि कोई भी बिना पैसे लिए किसी का कोई काम नहीं करता।
    यहाँ ठगी, वैमनस्यता और एक दूसरे को नोच-खाने के लिए तरह-तरह की दूकानें खुली हुई थीं, लूटने की प्रवृति लोगों के चेहरे पर साफ झलक रही थी। यहाँ सब कझ्छ दिखाई दिया, लेकिन बड़ा अफसोस और भारी मन से कहना पड़ रहा है कि कचहरी परिसर और भारत भूमि पर मनुष्य-रूपी जीव में मनुष्यता के दर्शन नहीं हुए। किसी में इंसानियत नहीं दिखी। जहाँ भी दीखी कराहती हुई, पीडि़त और प्रताडि़त रूप में दिखी।
 
     अब आप खुद फैसला करें कि हमें कैसी व्यवस्था चाहिए। सभा विसर्जित कर दी जाती है।

 
साभार अरुण कुमार झा
प्रधान संपादक (दृष्टिपात हिंदी मासिक)
प्रसारक -  सिया राम भारती 


 



गुरुवार, 1 नवंबर 2012

जीवन सूत्र 


 1-  लक्ष्य के बिना  जीवन बिना पता लिखे लिफाफे के समान है  जो कहीं  नहीं पहुंच  सकता !

 2-  एक पत्थर सिर्फ एक बार मंदिर जाता है और भगवान् बन जाता है , हम इंसान हर रोज मंदिर जाते हैं फिर  भी पत्थर ही रहते हैं !

3-  यदि जीवन में लोकप्रिय होना  हो तो सबसे ज्यादा "आप " शब्द का , उसके बाद  "हम "शब्द का और सबसे कम मैं शब्द का उपयोग करना चाहिए !

4-  मंजिल मिल जाएगी  भटकते ही सही , गुमराह तो वो हैं जो घर से निकलते ही नहीं  !

5-  अगर लगने लगे कि  लक्ष्य हांसिल नहीं हो पायेगा , तो लक्ष्य को नहीं प्रयासों  को बदलें !

6-  टूट जाता है गरीबी में वो रिश्ता जो खास होता है , हजारों रिश्ते बनतें  हैं जब  पैसा  पास होता है !

7-  जन्म के लगभग दो वर्षों  बाद इंसान बोलना  सीख लेता है लेकिन क्या बोलना है ये सीखने में पूरा जीवन लगा देता है !

8-  श्वयम पर विश्वाश करके , पूरे आत्मविश्वाश के साथ कार्य करें  हम सब कुछ कर सकतें हैं!
भारती के हाइकू

 उनसे  मिले
मन हुआ द्रवित
नयन झरे


न झकझोर
प्रीत की वह डोर
मन टूटेगा


वे आ तो गए
हुए न नजरबंद
चछु -कोर में


मिली नजर
तन-मन मगन
मिला गगन


दिल के टुकड़े
यादों  संग जकड़ें
चलें  अकेलें

गुरुवार, 13 सितंबर 2012




ALLAHABAD: Sending a letter of love, appreciation or good will from the spiritual spot of the confluence of Ganga, Yamuna and the mythical Saraswati is likely to become an easy task, as the postal department is all set to establish a floating post office near the Sangam, much to the convenience of devotees, who come from far and wide. The sea of humanity in Allahabad during the 2013-Mahakumbh may pose a stiff challenge for the telecom operators and service providers, as the lines of communications may get choked due to excess overload.  By Shri K.K.Yadav DPS Allahabad

बुधवार, 5 सितंबर 2012

हिन्दी पखवाड़ा

हिन्दी में बोले और गायें
निशदिन 'हिन्दी दिवस मनाये
आओ हम खुद को पहचाने
अंग्रेजी संग हुए बेगाने
जिसे बोलते जीभ लचकती
अधरो पर मुस्कान न आये।
हिन्दी में बोले और गायें
निशदिन 'हिन्दी दिवस मनाये

'हिन्दी का आया पखवाड़ा
भागी इंगिलश देख अखाड़ा
भाव विखर कर गिरती जाती
हिन्दी के सम्मुख टिक न पाती
कर्णप्रिय लगती 'निज" भाषा
जन-जन में ये भाव जगाये
हिन्दी मे बोलें और गायें
निशदिन दिवस मनायें

हिन्दी की उन्नति की खातिर
तन-मन से यदि होगे हाजिर
उन्नति भी अपनी ही होगी
दुनिया सपनों सी ही होगी
रहे अंधेरा न कहीं धरा पर
आओ, ऐसा दीप जलायें
हिन्दी में बोले और गायें
निशदिन हिन्दी दिवस मनायें

मेरा पहला गुरू

मां ने
बहुत सरल बहुत प्यारी
बहुत भोली
मां ने
बचपन में
मुझे एक गलत
आदत सिखा दी थी
कि सोने से पहले
एक बार
बीते दिन पर
नजर डालो और
सोचो कि तुमने
दिन भर क्या किया
बुरा या भला
सार्थक या निरर्थक
मां तो चली गई
सुदूर क्षितिज के पार
और बन गई
एक तारा नया
इधर जब रात उतरती है
और नींद की गोली खाकर
जब भी मैं सोने लगता हूं
तो अचानक
एक झटका सा लगता है
और
मैं सोचते बैठ जाता हूं
कि दिन भर मैंने
क्या kiya कि
आज के दिन
मैं कितनी बार मरा
कितनी बार जिया
फिर जिया
इसका हिसाब
बड़ा उलझन भरा है
मेरा वजूद जाने कितनी बार मरा है
यह दिन भी बेकार गया
मैंने देखे
मरीज बहुत
ठीक भी हुए कई
पर नहीं है
यह बात नई
इसी तरह तमाम जिन्दगी गई
जो भी था मन में
जिसे भी माना
मैंने सार्थक
तमाम उम्र भर
वह आज भी नहीं कर पाया मैं
न तो कभी
अपनी मर्जी से जिया
न ही
अपनी मर्जी से मर पाया मैं।


शुक्रवार, 29 जून 2012

kabooter bana Dakiya

पुराने समय में ही नहींए बल्कि 19 वीं सदी की शुरुआत में होने वाले पहले विश्वयुद्ध तक कबूतर से संदेश भेजा जाता था। कबूतरों में भी होमिंग प्रजाति इसके लिए विशेष रूप से जानी जाती थी। होमिंग प्रजाति के कबूतरों की विशेषता थी कि वे उन्हें एक जगह से अगर किसी जगह के लिए भेजा जाता तो वे अपना काम करने के बाद वापस लौटकर अपनी जगह आते थे। इससे संदेश पहुंच जाने की पुष्टि भी हो जाती थी। बताया जाता है कि होमिंग प्रजाति के कबूतर अपनी जगह से 1600 किमी आगे उड़कर जाने पर भी रास्ता भटके बिना वापस लौट आते थे। उनके उड़ने की रफ्तार भी 60 मील प्रति घंटा होती थी i

सोमवार, 21 मई 2012

नेता

 टिकट लेने गये उम्मीदवार से
सवाल किया गया
कि नेता क्या होता है?
उम्मीदवार कुछ हिचकिचाया
और अगले पल मुस्कुराया
उने चारो ओर निगाह दौडाइ
मुस्कुराते हुये बोला भाइ
जो सख्श देश की रक्षा के लिये
आपको सहर्ष कुर्वान कर देता है।
वही आज का प्रगतिवादी नेता है।

शनिवार, 12 मई 2012

मातृ-दिवस

मातृ-दिवस

हर दिन मेरी  माँ  का दिन
कुछ भी नहीं मैं माँ के बिन
हर पल पोषा जन्म दिया
पाला-पोषा नाम दिया
मुझे संवारा दिन गिन-गिन

हर दिन मेरी  माँ का दिन
कुछ भी नहीं मैं माँ के बिन

बुधवार, 28 मार्च 2012

श्रमिक

तपे दुपहरी जेष्ठ महीना
टप-टप तन से चुए पसीना
सर पर लादे भारी ईंटे
चहरे पर मोती सी छींटें
गर्व से करता उन्नत सीना........

तपे दुपहरी जेष्ठ महीना............

जागी आखों में है सपने
उसके पीछे जो हैं अपने
अपनों में हैं बीबी-बच्चे
उदर रिक्त पर मन के सच्चे
रहे सदा ही रूश्वाई में
खेल रहें वे तन्हाई में
पास नहीं है कोई खिलौना........

तपे दुपहरी जेष्ठ महीना...........

खुले नयन दर्दीला सपना
न ही पूर्ण वसन हैं तन पर
न ही तन पर कोई गहना
याद उसे है बीते कल की
इन चीजों की न कोई कमी थी
रहे सदा सैकड़ौं चाकर
बच्चें -खेलें कूदे अंगना.............

तपे दुपहरी जेष्ठ महीना............

इसीलिए प्रयास कर रहा
निज-सम्पतित हो आश कर रहा
सफर अभी बहुत है बाकी
लुप्त हो गयी खुद की झांकी
भारती वो खुद को रहा खोजता
फिर भी खुद को मिला कहीं ना.......

तपे दुपहरी जेष्ठ महीना
टप-टप तन से चुए पसीना

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

नारी

जन्म लेने से पहले ही
मार दी जाती है ‘बाला’
न रहम उसकी खातिर
न उसके पथ में ‘उजाला’

अगर बच गयी
यदि जन्म ले लिया तो
जकड़ दी जाती
फौलादी बेडियों में
दबकर, सिमट कर
है जीना उसकी फितरत
बसर कर रही है
कई भेडि़यों में

ले आवलम्बन अभी भी
सदा जी रही है
कटु, विष के प्याले
सदा पी रही है
कभी माता-पिता तो
कभी पति की दासी
है ‘ममता’ का सागर
रहती फिर भी है प्यासी
नहीं सुख का आंचल
”भारती“है गहरी उदासी



बुधवार, 18 जनवरी 2012

गरीब लडकी

-गरीब लड़की-
सामाजिक दहलीज पर
अपने घर के कोने की तरह
रह रह कर ठिठक जाती है
एक गरीब की लड़की
उसी समाज में जहाँ
कम एवं छोटे वस्त्र पहनना
नित्य नया फैशन माना जाता है
वहीँ गरीब की लड़की
अपने फटे वस्त्रों में
अपनी लाज छुपाने के लिए
बार बार सिमट जाती है।
उसे महसूस होत है
उन निगाहों की चुभन
जो बेहयाई से झांकती हैं
सूक्ष्म छिद्रों से उसका तन
और वह पी जाती है पीड़ा
मसोसकर अपना मन

बुधवार, 18 मई 2011

आम्रपाली

दिन था इतवार का
आराम के इजहार का
मीठे सपनो संग सो रहे थे
टूटे ख्यालों मे खो रहे थे
तभी ग्रहमंत्री ने झकझोर दिया था
हमको उठने का जोर दिया था

बोली भोर भयी सोते ही रहोगे
क्या सपनो मे खोते ही रहोगे
घर का सारा काम बकाया
दिनकर कितना ऊपर चढ़ आया

जाओ चाहे लौट नहाना
कुछ गेहूं हैं आज पिसाना
हर दिन तो दफतर जाते हो
पर छुट्टी मे घर मे घुस जाते हो
हमको चाहे न ले जाना
पर बच्चों को है आज घुमाना
इतना सुनकर हम उठ जागे
झटपट शौचालय को भागे

दैनिक क्रिया से निपट चुके तब
मीठी वाणी मे हमसे बोले सब
मिलकर जोर बजाओ ताली
अब जायेंगे हम आम्रपाली


यही सोच कर कदम बढ़े
पड़ोसी के घर जा ठहरे
सोचा कुछ उन्हे बता डालें
पर वहां नही दिखे चेहरे


आवाज सुनी आई बाला
जिसे देख पड़ा लब पर ताला
पूंछा उससे सब गये कहां
तुम तड़प रही हो यहां वहां
वह बोली होकर मतवाली
सब गये आज आम्रपाली
कह गये मुझे तुम रूको यहीं
घर की मांजो जूठी थाली

घर लौटे हम बनकर भोले
ग्रहणी से हंस कर बोले
जल्दी भी करो हे भाग्यवान
न छोड़ो चितवन की कमान

ऐसा भी न सिंगार करो
जो दर्पण भी जाये हार
कितने तो छाती पीटेंगे
कितने झट मारेंगे कटार


ग्रहणी मुस्का कर बोली
अब अजी रहो तुम चुपचाप
मेरे मन का तो कर न सके
नित देते नये.- नये संताप
ग्रहणी के ऐसे बचन सुने
झटपट होठों को सी डाला
हम अक्स देख भये मूर्क्षित
जैसे देखी हो “मधुशाला ”

टैम्पो से जैसे ही उतरे
झट से सम्मुख आया माली
चाहे ले लो गलहार पुष्प
चाहे लो कानो की बाली
बाबूजी बीबी यदि पहनेगीं
तो लगेंगी जैसी मधुबाला
“मधुबाला” भी शर्मायेंगी
लगेंगी कोई सुरबाला



यह सुनकर रणचन्डी प्रगटीं
हुंकार भरी ली अंगड़ाई
बोली जा पामर भाग अभी
क्या तेरी है शामत आई
बोली जा पामर भाग-भाग
नही ऐसी खैर बनाऊंगी
निज पावों की ऊँची सैंडिल को
तेरे सिर पर सैर कराऊंगी


आम्रपाली के फाटक पर
दर्शक दीर्घा की भीड़ भयी
लम्बी लाइनो को देख-देख
हमारी गति तो अति क्षीण भयी
मौके का फायदा पा करके
बहती गंगा मे हाथ धुले
दर्शक दीर्घा मे समाय गये
और अन्दर बिना टिकट निकले
अन्दर अचरज मे डूब गये


तेजी से फड़क उठा गुर्दा
पल भर के लिये हम भूल गये
कि हम जिन्दा हैं या मुर्दा
चहुँ ओर रंगीन फौहारे थे
सुर बालायें थीं भीग रहीं
रंगीन नजारा देख देख
थीं श्रीमती जी खीझ रहीं

एक सुन्दर सी बेन्च पर
लिया श्रीमती ने आसन
लगा रहे थे वहीं पर
एक मोटे जी पद्मासन



बोले देवी जी दूर रहो
मैं हूँ ध्यान योग मे डूबा
चंचल चितवन को कैद करो
मुझपर नजर रखे महबूबा
उतार वस्त्र जब तरण ताल मे
सब बच्चे लगे नहाने
उछल-उछल कर कूद-कूद कर
लगे खुद पर ही इठलाने
सोचा कहीं आसन ग्रहण करें
दें दें तन को आराम
स्थान मिला पर कहीं नही
हम खड़े रहें विश्राम


तभी हमारी कमर पर
हुआ जोर से वार
विकराल विकट सम वार से
निज कमर गई थी हार
एक मोटी मोहतरमा ने
किया था एक्सीडेन्ट
कमर के एक ही वार ने
भू पर कर दिया परमानेन्ट

वो बोली क्या अन्धे हो
या सूरदासी औलाद
हम सोच रहे थे खड़े-खड़े
ये कमर है या फौलाद
मै बोला मोहतरमा जी
तुम क्यों खाती हो तैस
दूर से तुम लगती हो हिरनी
और पास से लगती भैंस

मेरी पतली सी कमर पर
तुमने किया अटैक
दिल की धड़कन भी तीव्र हुई
पर हुआ न हार्ट अटैक



वो बोली इस तरह से
हमे न दीजिये गाली
एड़ी चोटी के जतन से
हम पहुंचे आम्रपाली

हमारे घर के कोने मे
जितनी थी फूटी थाली
ढेर लगा कर झटपट ही
कल्लू कबाड़ी को दे डाली

उन थलियों के विक्रय से
जो रकम थी हमने पाई
आम्रपाली घूमने की थी
हमने स्कीम बनायी


इसीलिये सजना के संग
मै पहुंची आम्रपाली
तुमने तो आज बढ़ा डाली
मेरे गालों की लाली


हमने सोचा इस दुनिया मे
हैं कैसे-कैसे शौकीन
”भारती“ कैसा भी समय रहे
पर रहते हैं रंगीन

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

काला पानी के १०५ साल

काला पानी के 105 साल सेलुलर जेल की 105 वीं वर्षगाँठ पर : क्रान्तिकारियों के बलिदान का साक्षी- सेल्युलर जेलयह तीर्थ महातीर्थों का है.मत कहो इसे काला-पानी.तुम सुनो, यहाँ की धरती केकण-कण से गाथा बलिदानी (गणेश दामोदर सावरकर)भारत का सबसे बड़ा केंद्रशासित प्रदेश अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह सुंदरता का प्रतिमान है और सुंदर दृश्यावली के साथ सभी को आकर्षित करता है। बंगाल की खाड़ी के मध्य प्रकृति के खूबसूरत आगोश में विस्तृत 572 द्वीपों में भले ही मात्र 38 द्वीपों पर जन-जीवन है, पर इसका यही अनछुआपन ही आज इसे प्रकृति के स्वर्ग रूप में परिभाषित करता है। यहीं अंडमान में ही ऐतिहासिक सेलुलर जेल है। सेलुलर जेल का निर्माण कार्य 1896 में आरम्भ हुआ तथा 10 साल बाद 10 मार्च 1906 को पूरा हुआ। सेलुलर जेल के नाम से प्रसिद्ध इस कारागार में 698 बैरक (सेल) तथा 7 खण्ड थे, जो सात दिशाओं में फैल कर पंखुडीदार फूल की आकृति का एहसास कराते थे। इसके मध्य में बुर्जयुक्त मीनार थी, और हर खण्ड में तीन मंजिलें थीं।1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने अंग्रेजी सरकार को चैकन्ना कर दिया। व्यापार के बहाने भारत आये अंग्रेजों को भारतीय जनमानस द्वारा यह पहली कड़ी चुनौती थी जिसमें समाज के लगभग सभी वर्ग शामिल थे। जिस अंग्रेजी साम्राज्य के बारे में ब्रिटेन के मजदूर नेता अर्नेस्ट जोंस का दावा था कि-‘‘अंग्रेजी राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं और खून कभी सूखता नहीं‘‘, उस दावे पर ग्रहण लगता नजर आया। अंग्रेजों को आभास हो चुका था कि उन्होंने युद्ध अपनी बहादुरी व रणकौशलता की वजह से नहीं बल्कि षडयंत्रों, जासूसों, गद्दारी और कुछेक भारतीय राजाओं के सहयोग से जीता था। अपनी इन कमजोरियों को छुपाने के लिए जहाँ अंग्रेजी इतिहासकारों ने 1857 के स्वाधीनता संग्राम को सैनिक गदर मात्र कहकर इसके प्रभाव को कम करने की कोशिश की, वहीं इस संग्राम को कुचलने के लिए भारतीयों को असहनीय व अस्मरणीय यातनायें दी गई। एक तरफ लोगों को फांसी दी गयी, पेड़ों पर समूहों में लटका कर मृत्यु दण्ड दिया गया व तोपों से बांधकर दागा गया वहीं जिन जीवित लोगों से अंग्रेजी सरकार को ज्यादा खतरा महसूस हुआ, उन्हें ऐसी जगह भेजा गया, जहाँ से जीवित वापस आने की बात तो दूर किसी अपने-पराये की खबर तक मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं रख सकते थे और और यही काला पानी था। एक तरफ हमारे धर्म समुद्र पार यात्रा की मनाही करते थे, वहीँ यहाँ मुख्यभूमि से हजार से भी ज्यादा किलोमीटर दूर लाकर देशभक्तों को प्रताड़ित किया जाता था। अंग्रेजी सरकार को लगा था कि सुदूर निर्वासन व यातनाओं के बाद स्वाधीनता सेनानी स्वतः निष्क्रिय व खत्म हो जायेंगे पर यह निर्वासन व यातना भी सेनानियों की गतिविधियों को नहीं रोक पाया। वे तो पहले से ही जान हथेली पर लेकर निकले थे, फिर भय किस बात का। अंग्रेजी हुकूमत ने काला पानी द्वारा इस आग को बुझाने की जबरदस्त कोशिश की पर वह तो चिंगारी से ज्वाला बनकर भड़क उठी। सेलुलर जेल, अण्डमान में कैद क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों ने जमकर जुल्म ढाये पर जुल्म से निकली हर चीख ने भारत माँ की आजादी के इरादों को और बुलंद किया।क्रान्तिकारियों का मनोबल तोड़ने और उनके उत्पीड़न हेतु सेल्यूलर जेल में तमाम रास्ते अख्तियार किये गये। स्वाधीनता सेनानियों और क्रातिकारियों को राजनैतिक बंदी मानने की बजाय उन्हें एक सामान्य कैदी माना गया। यही कारण था कि क्रांतिकारियों को यहीं सेलुलर जेल की काल-कोठरियों में कैद रखा गया और यातनाएं दी गईं। यातना भरा काम और पूरा न करने पर कठोर दंड दिया जाता था। पशुतुल्य भोजन व्यवस्था, जंग या काई लगे टूटे-फूटे लोहे के बर्तनों में गन्दा भोजन, जिसमें कीड़े-मकोड़े होते, पीने के लिए बस दिन भर दो डिब्बा गन्दा पानी, पेशाब-शौच तक पर बंदिशें कि एक बर्तन से ज्यादा नहीं हो सकती। ऐसे में किन परिस्थितियों में इन देश-भक्त क्रांतिकारियों ने यातनाएं सहकर आजादी की अलख जगाई, वह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सेलुलर जेल में बंदियों को प्रतिदिन कोल्हू (घानी) में बैल की भाँति घूम-घूम कर 20 पौंड नारियल का तेल निकालना पड़ता था। इसके अलावा प्रतिदिन 30 पौंड नारियल की जटा कूटने का भी कार्य करना होता। काम पूरा न होने पर बेंतों की मार पड़ती और टाट का घुटन्ना और बनियान पहनने को दिए जाते, जिससे पूरा बदन रगड़ खाकर और भी चोटिल हो जाता। अंग्रेजों की जबरदस्ती नाराजगी पर नंगे बदन पर कोड़े बरसाए जाते। जब भी किसी को फांसी दी जाती तो क्रांतिकारी बंदियों में दहशत पैदा करने के लिए तीसरी मंजिल पर बने गुम्बद से घंटा बजाया जाता, जिसकी आवाज 8 मील की परिधि तक सुनाई देती थी। भय पैदा करने के लिए क्रांतिकारी बंदियों को फांसी के लिए ले जाते हुए व्यक्ति को और फांसी पर लटकते देखने के लिए विवश किया जाता था। वीर सावरकर को तो जान-बूझकर फांसी-घर के सामने वाले कमरे में ही रखा गया था। गौरतलब है कि सावरकर जी के एक भाई भी काला-पानी की यहाँ सजा काट रहे थे, पर तीन सालों तक उन्हें एक-दूसरे के बारे में पता तक नहीं चला। इससे समझा जा सकता है कि अंग्रेजों ने यहाँ क्रांतिकारियों को कितना एकाकी बनाकर रखा था। फांसी के बाद मृत शरीर को समुद्र में फेंक दिया जाता था। अंग्रेजों के दमन का यह एक काला अध्याय था, जिसके बारे में सोचकर अभी भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।सेल्यूलर जेल आजादी का एक ऐसा पवित्र तीर्थस्थल बन चुका है, जिसके बिना आजादी की हर इबारत अधूरी है। इसके प्रांगन में रोज शाम को लाइट-साउंड प्रोग्राम उन दिनों की यादों को ताजा करता है, जब हमारे वीरों ने काला पानी की सजा काटते हुए भी देश-भक्ति का जज्बा नहीं छोड़ा। गन्दगी और सीलन के बीच समुद्री हवाएं और उस पर से अंग्रेजों के दनादन बरसते कोड़े मानव-शरीर को काट डालती थीं। पर इन सबके बीच से ही हमारी आजादी का जज्बा निकला। पर इस इतिहास को वर्तमान से जोड़ने की जरूरत है। सेलुलर जेल अपने अंदर जुल्मों की निशानी के साथ-साथ वीरता, अदम्य साहस, प्रतिरोध, बलिदान व त्याग की जिस गाथा को समेटे हुए है, उसे आज की युवा पीढ़ी के अंदर भी संचारित करने की आवश्यकता है। सेलुलर जेल की खिड़कियों से अभी भी जुल्म की दास्तां झलकती है। ऐसा लगता है मानो अभी फफक कर इसकी दीवालें रो पड़ेंगी।वाकई आज देश के हरेक व्यक्ति विशेषकर बच्चों को सेल्युलर जेल के दर्शन करने चाहिए ताकि आजादी की कीमत का अहसास उन्हें भी हो सके। देशभक्ति के जज्बे से भरे देशभक्तों ने सेल्युलर जेल की दीवारों पर अपने शब्द चित्र भी अंकित किये हैं। दूर-दूर से लोग इस पावन स्थल पर आजादी के दीवानों का स्मरण कर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं व इतिहास के गर्त में झांककर उन पलों को महसूस करते हैं जिनकी बदौलत आज हम आजादी के माहौल में सांस ले रहे हैं। बदलते वक्त के साथ सेल्युलर जेल इतिहास की चीज भले ही बन गया हो पर क्रान्तिकारियों के संघर्ष, बलिदान एवं यातनाओं का साक्षी यह स्थल हमेशा याद दिलाता रहेगा कि स्वतंत्रता यूँ ही नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे क्रान्तिकारियों के संघर्ष, त्याग व बलिदान की गाथा है।आज सेलुलर जेल की गाथा को लोगों तक पहुँचाने के लिए तमाम श्रव्य-दृश्य साधनों का उपयोग किया जा रहा है, पर इसे लोगों की भावनाओं व जज्बातों से भी जोड़ने की जरूरत है। 10 मार्च 2011 को सेलुलर जेल अपनी स्थापना के 105 वर्ष पूरे कर रहा है और इसी के साथ इसके वैचारिक विस्तार की भी आवश्यकता है ताकि देश के अन्य भागों में भी उस भावना को प्रवाहित किया जा सके, जिस हेतु हमारे सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। आजादी का यह तीर्थ किसी मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे-चर्च से कम नहीं। यह हमारी वो विरासत है जो सदियों तक आजादी की उस कीमत का अहसास कराती रहेगी, जिसके लिए बलिदानियों ने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। कल सेलुलर जेल की 105 वीं वर्षगाँठ पर उन सभी नाम-अनाम शहीदों और कैद में रहकर आजादी का बिगुल बजाने वालों को नमन !!कृष्ण कुमार यादव KK Yadav पर