गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

डाकिया

तन पर झोला , मन है भोला
घूम रहा है गली - गली
आओ अपनी चिठ्ठी ले लो
हर द्वार-द्वार पुकार चली

मीठे -मीठे श्वर को सुनकर
मुरझाये चेहरे खिल जाते
यादों में है जिन्हें बसाया
पत्रों में आकर मिल जाते

वर्षा हो या जेष्ठ दुपहरी
तूफां हो या शीत हो गहरी
हर मौसम में नित-दिन आता
बन करके "हर दिल" का प्रहरी

सबसे उसका प्रेम का नाता
नित-दिन नयें संदेशे लाता
हर सुख-दुःख का वह भागी है
हर "दिल" उसका अनुरागी है

6 टिप्‍पणियां:

anjana ने कहा…

बढिया ....

kshama ने कहा…

Kitni saral sundar rachana hai!wah!

KK Yadava ने कहा…

Bahut pyari rachna..badhai.

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

सबसे उसका प्रेम का नाता
नित-दिन नयें संदेशे लाता
हर सुख-दुःख का वह भागी है
हर "दिल" उसका अनुरागी है.

...Sundar bhavabhivyakti..Dakiya ka intzar ham sabhi ko !!

आशीष/ ASHISH ने कहा…

Dakiya daak laya....
Achhi rachna!!!
Phone aur net ne halanki chitthi ka mahatv ghata diya hai.....

raghav ने कहा…

भारती जी
ब्हुत सुन्दर कवित लिखी आपने आपको बधायी