शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

चोर

आओ उनकी याद दिलायें
जो अब नहीं मिलते
जो अपने फटे मामलों को
कभी नही सिलते
ये हैं लुटिया चोर, टिकिया
चोर मुर्गी चोर , अण्डा चोर
ये चोर वक्त की करवट की तरह
अब ठण्डे आमलेट हो गये हैं
वक्त की पर्त में लम्पलेट हो गये हैं
आज आधुनिक युग विकसित चोर पाये जाते हैं
जैसे ‘कर’ चोर, बिजली चोर
ये चोर बहुतायत में पाये जाते हैं
आज ‘चित-चोर’ की जगह
‘‘वित्त-चोर’’ का बोल बाला है
इस चोर ने समाज औ सरकार का
हर नट-बोल्ट खोल डाला है
इन नये चोरों का एक ही सिद्धान्त है
इनकी कृत्य की कड़ी का अलबेला वृतान्त है
कि केवल वित्त ही चुराओ
यदि कभी पकडे़ जाओं
तो ‘‘वित्त’’ देकर ही
सामने वाले का ‘चित’ चुराओ

2 टिप्‍पणियां:

: केवल राम : ने कहा…

‘‘वित्त-चोर’’ का बोल बाला है
इस चोर ने समाज औ सरकार का
हर नट-बोल्ट खोल डाला है
इन नये चोरों का एक ही सिद्धान्त है
इनकी कृत्य की कड़ी का अलबेला वृतान्त है


भारती जी
आपकी रचना वर्तमान व्यवस्था पर करार व्यंग्य करती है ..पर क्या कहें यह लोग नहीं सुधरने वाले ...आपने बहुत सजीदगी से पिरोया है शब्दों को ...शुक्रिया आपका ...हार्दिक शुभकामनायें

: केवल राम : ने कहा…

आपका लेखन बहुत सशक्त है यूँ ही अनवरत लिखते रहिये ...ब्लॉग जगत तो समृद्ध करते रहिये ...शुक्रिया