आवाज कुछ मुख से निकलती ,इससे पहले
फद्फदाकर पंख पंछी उड़ चला था
रात दिन जो कोसते उसको रहे थे
कह चले "इन्सान " वो कितना भला था
आज से पहले न था रब को पुकारा
ओउर देखा भी न था मन्दिर का द्वारा
गुरुद्वारे जा के भी न माथा टेका
घंट -नाद चर्च का भी न सुना था
आज पंछी उड़ चला थल छोड़कर जो
"भारती" मन्दिर न मस्जिद कर्बला था
शिक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल : अनुशासन या अपमान !
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हाल के दिनों में विद्यालय में छात्राओं को “मुर्गा” बनाकर दंड देने की घटना
को लेकर व्यापक चर्चा और विवाद देखने को मिला है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो
सामने ...
7 घंटे पहले

1 टिप्पणी:
बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.
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