गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

06 December, 2010

सिकंदर को कौन समझाए !!!
- रश्मि प्रभा...

कोई मानना नहीं चाहता
सही शब्दों में कहें
तो स्वीकार करना नहीं चाहता
कि जिस धरती पर खून खराबे हुए
जहाँ अपमान के शूल बिछाए गए
वहाँ कोई घर बन सकता है
और वहाँ की दीवारें गा सकती हैं !....
अपने 'स्व' की मद में डूबा इन्सान
सूक्तियां बोलता है
रुपयों के बल पर
सिकंदर बनता है
पर एक टूटी झोपड़ी
महल के अस्तित्व को फीका कर जाये
बर्दाश्त नहीं कर पाता है
हर मोड़ पर झोपड़ी की रोटी का सोंधापन
प्रतिस्पर्धा का सबब बन जाता है
....
दुखद तो है
पर कड़वा सत्य है
महल के हर कदम
फैसले की मुहर लिए बढ़ते हैं
'झोपड़ी को तोड़ दिया जाये' !
जब जब यह फैसला होता है
उस दिन झोपड़ी की दीवारें नहीं गातीं
....
और भगवान् -
जी जान से नई धुन बनाता है
दीवारों को जिंदा करने के लिए
खुद गाता है
....
अब यह सिकंदर को कौन समझाए !!!

3 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रश्मि प्रभाजी की एक सशक्त रचना ...

Akshita (Pakhi) ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा आपने...बधाई.
______________
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POOJA... ने कहा…

बड़ी माँ जब भी लिखतीं हैं, गज़ब ही होता है...