तेरी रचनाओं के शायद ,मिल न पायें रोज पाठक
फिर भी तुझको “लेखनी” का ही, बना रहना है साधक
चाहे जैसा हो “ सिकन्दर ”है नहीं पल का ठिकाना
चाहें दुर्गम ही सफर हो , राह चलता नित्य चालक
तेरी रचनाओं के शायद ,मिल न पायें रोज पाठक
वृक्षारोपण के समय मन ,फल-ग्रहण का भाव लाते
अन्य सारे भाव तजकर ,वृक्षारोपण को न जाते
दूसरे को दे शीतलता , ग्रहण करते रहे पावक
तेरी रचनाओं के शायद ,मिल न पायें रोज पाठक
एक निंदा हो गयी क्या , “ लेखनी ” को रोक बैठा
थम गया स्वर सामने का , कोई श्रोता टोक बैठा
बुलन्द कर ले लेखनी को , निखार ले सुर-गंग-धारा
आज न हो पाया तेरा , कल “ भारती ” संसार सारा
राह दिखलाता चला जा , पथिक न कोई भटक पाये
मंजिलें उनको मिली हैं ,जो धार को हैं मोड़ पाये
प्यार बरसाता चला जा , प्यासा रहे न कोई “चातक”
तेरी रचनाओं के शायद ,मिल न पायें रोज पाठक
वित्तीय समावेशन, डिजिटल नवाचार से ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स तक, भारतीय डाक सुदूर
क्षेत्रों तक निभा रहा अहम भूमिका- पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव
-
भारतीय डाक विभाग अपनी दूरदर्शी कार्यशैली और ‘डाक सेवा-जन सेवा’ के मूल मंत्र
के साथ देश के कोने-कोने तक विश्वसनीय एवं सुलभ सेवाएँ पहुँचाने में निरंतर
अग्र...
3 हफ़्ते पहले

5 टिप्पणियां:
भारती जी,
नमस्कार!
अजी क्यूँ ना मिलें पाठक! लीजिये हम आ गए! पढ़ भी लिया.....
कुछ सुझाव: 'वृक्षारोपण' सही है, वृक्षा-रोपड़ नहीं!
दुसरे के स्तान पर 'दूसरे' कर लीजिये!
जय हो!
और मेरी टिपण्णी में स्तान के स्थान पर 'स्थान' कर लीजिये....
हा हा हा!
भारती जी,
नमस्कार!
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..
खूबसूरत अभिव्यक्तियाँ...बधाई.
एक टिप्पणी भेजें