मंगलवार, 12 जनवरी 2010

गुजरती Pidiyan

जाने क्यों लोग ऐसा करते हैं
जिनको कहते हैं अपना
नित्य प्रति उन्हीं को दुख पहुँचाते है
वे जानते है कि जो,
आज हुआ है प्रचलित
वही भविष्य के जगमगाहट में
हो जायेगे विस्मृत
फिर भी न जाने क्यों
दोहराते है इतिहास
और कल के आगोश में
बन जाते है परिहास
घोर आश्चर्य है कि
करते हैं उपेक्षा उनकी
मात्र दो रोटी और कुछ बुंदे
भूख-प्यास है जिनकी
जिन्होंने चार-पाँच को,
अकेले है पाला
वही उन्हे नही दे पा रहे है
मात्र दो कौर निवाला
अब तो वे न आ रहे
है ‘‘बूँदो’’ के काम
जिनके लालन-पालन में
नहीं किया विश्राम
यहाँ सभी को याद है
‘‘श्री गीता’’ का ज्ञान
कर्मो के आधार पर
फल देता भगवान
फिर भी इस संदेश को
है जाते वे भूल

2 टिप्‍पणियां:

KK Yadava ने कहा…

Badhiya rahi..

_______________
शब्द सृजन की ओर पर पढ़ें- "लौट रही है ईस्ट इण्डिया कंपनी".

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com