शुक्रवार, 21 मई 2010

दलित उत्थान ओंर मायावती

शास्त्रों के अनुसार महिलाओं और शूद्रों को समान अधिकार प्राप्त थे जहाँ शूद्रों से धार्मिक पूजा पाठ सम्बन्धी कार्यों की अपेक्षा नहीं की जाती थी उसी प्रकार महिलाओं को शिक्षा ग्रहण का अधिकार प्राप्त नहीं था। महिलाओं को कुविचारी, स्तैण, दुष्ट और चंचल माना जाता था। ऐसी मान्यता थी कि यदि कोई स्त्री शिक्षा ग्रहण करती है तो उसे बंध्यता का शिकार होना पड़ेगा। वह पति के घर वालों की इज्जत नहीं करेगी और वह जिद्दी स्वभाव की हो जायेगी। समाज में उसके बोलने पर भी प्रतिबन्ध था। यदि कोई परिवार उसकी बुद्धि के अनुसार चलेगा तो उस परिवार का विनाश हो जायेगा। शास्त्रों में वर्णित पूर्व समाज के अनुसार स्त्री मात्र ‘परायी अबला‘ थी उसे अपने पूरे जीवन भर माता-पिता, भाई, पति और उसके परिवार वालों के ही अधीन अपना जीवन गुजारना पड़ता था यहाँ तक उसके पैरों में चप्पल अथवा जूता पहनना भी अशुभ माना जाता था। समाज में स्त्री दोष और अज्ञानता का भण्डार मानी जाती थी। पूर्व समाज के अनुसार स्त्री को शिक्षित करना बन्दर के हाथ में उस्तरा देने के बराबर माना जाता था।
परन्तु ऐसे ही समाज में जन्मी और पली-बढ़ी एक ऐसी महिला जिसने शास्त्रों में वर्णित स्त्री से सम्बन्धित समस्त कुरीतियों की वर्जनाओं को नकारते हुए क्रूर समाज के सभी दुष्कृत्यों और आलोचनाओं का विरोध करने और उससे उत्पन्न पीड़ा को सहन करते हुए एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जिसे आज के महिला समाज ही नहीं वरन् विश्व के सभी वर्गों द्वारा सराहा जा रहा है। आज उन्हें ‘‘लौह-महिला‘‘ के विशेषण से भी सम्बोधित किया जाता है। हर दलित महिला के दिल पर जिनका एक क्षत्र राज है जिन्हे आम जन बहन मायावती एवं दलितों की देवी के नाम से जानते हैं। भले ही उन्हें कई महिलाओं ने प्रत्यक्ष रूप से न देखा हो परन्तु वे उनकी छवि को आत्मसात करने का प्रयास करती हैं और उनके संघर्षमय जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन के उज्जवल भविष्य की कामना करती हैं।
सुश्री मायावती जी ने ‘बहुजन हिताय‘ को ध्यान में रखते हुए उनके कल्याण के लिए भीमराव अम्बेडकर द्वारा चलाये गये अभियान को भली-भाँति निरंतर आगे बढ़ाने हेतु उत्तरोत्तर एवं सफल प्रयास किया। उनके ही सफल प्रयासों के द्वारा आज दलित खुलकर एवं स्वतंत्रता पूर्वक सवर्णों तथा मनुवादियों के क्रूर चंगुल से मुक्ति पाकर, निर्वाध रुप से जीवन यापन कर रहा है। सुश्री मायावती जी के स्त्री शिक्षा एवं महिला आरक्षण पर अधिक जोर देने के कारण ही आज ‘’महिला साक्षरता‘’ तथा ’’नारी सशक्तीकरण’’ प्रतिशत में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में उनकी निर्भीकता और अदम्य साहस से परिपूर्ण प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की प्रेरणा लेकर आज दलित समुदाय अपनी बात खुलकर प्रस्तुत करते हुए एक नये रूप में अपनी प्रतिभा को निखार कर समाज में प्रस्तुत कर पा रहा है और निरंतर अपना नैतिक स्तर ऊँचा उठाते हुए अपने रहन-सहन में सुधार लाने में कामयाब हो रहा है अर्थात् दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि दलित समुदाय की स्वतंत्र विचार अभिव्यक्ति, नैतिक उन्नति तथा रहन-सहन में सुधार संबन्धी अन्य क्रिया-कलापों में उत्तरोत्तर प्रगति का श्रेय सुश्री मायावती जी को ही जाता है। उन्हें एक ऐसे समाज की जननी कहा जा सकता है जिसके समुचित एवं सुव्यवस्थित निर्माण हेतु उन्होंने अपना पारिवारिक जीवन ही त्याग दिया।
प्राचीन सामाजिक परिवेश की दासता से दलित समुदाय को मुक्त कराने हेतु जो आन्दोलन उनके द्वारा चलाया गया उसमें उन्हें पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। आज दलित गण अधिकार सहित जो भी सुख-सुविधायें प्राप्त कर रहे हैं, अच्छा वेतन प्राप्त कर रहे हैं, अच्छे एवं ऊँचे पदों पर पहुँच रहे हैं एवं अच्छी जिन्दगी बसर कर रहे हैं। इन समस्त सुख-सुविधाओं की नीव में जहाँ भीमराव अम्बेडकर तथा अन्य महापुरूषों की कुर्बानियां, उनके द्वारा किये गये संघर्ष तथा त्याग की भावना समाहित है वहीं पर अम्बेडकर जी द्वारा चलाये गये आन्दोलनों को भली-भाँति आगे बढ़ाने में सुश्री मायावती जी के पूर्ण एवं सफल योगदान को किंचित मात्र भी नकारा नहीं जा सकता।
शास्त्रों में भी महापुरुषों द्वारा कहा गया है कि ‘‘नारी उन सप्त रत्नों मे सर्व श्रेष्ठ है जो किसी को भी चक्रवर्ती अर्थात विश्व सम्राट बना सकती है। जिस देश अथवा परिवार का समाज एवं व्यक्ति नारी को सम्मान नहीं देता, उसे देय स्वतंत्रता प्रदान नहीं करता और उसे किसी भी प्रकार का दुःख पहुँचाता है तो उस समाज अथवा व्यक्ति का विनाश निश्चित होता है।‘‘ परन्तु हमारा समाज शास्त्रों को ही मानता है, उनकी पूजा करता है, उसमें लिखी बातों को शुभ अवसरों पर प्रवचन तथा अन्य रुपों में श्रवण करता है। फिर भी कभी-कभी निजी स्वार्थों में लिप्त होकर मात्र तुच्छ लाभ के लिए शास्त्रों में वर्णित सद्वचनों को आत्मसात करने के बजाय उन्हे समूल नकार देता है। कुछ साल पहले घटी उस घटना को याद करके बड़ा आश्चर्य होता है कि हिन्दू परम्पराओं पर आधारित जीवन यापन करने वाले समाज के कुछ बुद्धिजीवी राजनीतिक एवं भ्रष्ट तत्वों द्वारा विधान सभा के अन्दर सुश्री मायावती जी की प्रतिष्ठा को नष्ट करने का असफल प्रयास करने का दुःसाहस किया गया और उनकी जान लेने की कोशिश की गयी। उक्त घटना की राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं अपितु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर घोर निन्दा की गयी।
यहाँ यह भी सराहनीय है कि सुश्री मायावती जी ने अपने शासन काल में लोक कल्याण संबंधी कई योजनाएं चलायीं फलस्वरूप प्रदेश प्रगति की ओर निरन्तर बढ़ता गया। उनके शासन काल में कानून व्यवस्था पूर्णतयः प्रजातन्त्र पर आधारित एवं प्रजा को संतुष्ट करने वाली रही तथा दंगों एवं भ्रष्टाचार का ग्राफ घटता गया। उनके पूर्व शासनकाल की एक घटना आज भी याद आती है जब राजधानी के किसी व्यवसायी के पुत्र का अपहरण हो गया था और विपक्षी दलों के दबाव के कारण उसकी खोजबीन में लापरवाही बरती जा रही थी तब सुश्री मायावती जी का एक ही ‘‘आदेश‘‘ जो उन्होंने पुलिस तन्त्र को दिया और उसके अनुपालन में अपृहत बच्चे की बरामदगी मात्र कुछ ही घण्टों में हो गयी अर्थात यह कहा जा सकता है कि उनके शासन काल में सामाजिक सुरक्षा प्रणाली अत्यधिक व्यवस्थित तथा ठोस रुप से लागू रही। समाज की उन्नति एवं रक्षा के लिए उन्होंने हर सम्भव प्रयास किया।
माननीय श्री कांशीराम के बाद बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदभार सम्भालते हुए उन्होंने प्रतिक्षण दलित समुदाय के हितों के लिए अपना पूर्ण योगदान दिया है। अपने इस अनूठे योगदान के कारण ही आज भी वे सत्ता में है। विपक्षी पार्टियों के घोर विरोध के बावजूद सत्ता में रहते हुए आज भी वे निरंतर लोकहित की बात उठाया करती हैं। उनकी नजर में ’’दलित’’ वह है जो समाज में दबा कुचला हुआ है जो कथित दबंगों द्वारा दासता में जकड़ा हुआ तथा कमजोर एवं शोषित है चाहे वह किसी भी जाति एवं वर्ग का क्यों न हो उसे वह दलित समुदाय का अंश मानती हैं और उन्होंने संकल्प लिया है कि इस वर्ग को सबल बनाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है ताकि यह वर्ग भी समाज में अपना आस्तित्व बनाये रखने में सक्षम हो और देश की सामाजिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक उन्नति में सहभागी हो, अर्थात यह कहा जा सकता है कि दलित समुदाय के हितों एवं अधिकारों की रक्षा करना ही उनका नैतिक एवं मौलिक दायित्व है।

शनिवार, 8 मई 2010

मातृत्व-दिवस पर विशेष



माँ


मेरी प्राणों से प्यारी माँ


तेरी विनती करता हूँ


मझधार में भटका हूँ


मुझे छोड़ न जाना तू


मेरी प्राणों..............




तेरा हाथ रहे सर पे


मेरा ‘जीवन’ उठ बैठे


मझधार में प्राण फंसे


मुझे पार लगाना तू


मेरी प्राणों.......




जब भी लडखडाये कदम


तुने थामा है तन मेरा
जब -जब हुआ मन मैला


तुने धोया है मन मेरा




तू दुर्गुण -नशनी है


तुझे शत-शत जपता हूँ ।


मेरी प्राणों से प्यारी तेरी


विनती करता हूँ
मझाधार में भटका हूँ


मुझे छोड़ न जाना तू

माँ - मात्रत्व दिवस पर विशेष



मेरी-माँ
माँ वह शब्द ,
जो मेरे मुह से पहली बार निकला
माँ वह वजूद जो मेरे साथ
हर कदम पर रही

माँ वह देवी ,
जिसकी वात्सल्य -छावं में ,
मै पला ,संवरा और आगे बढ़ा

माँ वह शक्ति जिसने मुझे
हर नजर और हर बला से बचाया
माँ वह अद्भुत शक्ति ,
जिस मैंने अपने लिए
हर जगह मह्सूश किया

माँ वह रछक जिसे मैंने ,
हमेशा अपने लिए ही पाया
माँ वह शिछ्क जिसने मुझे
पहला पाठ पढाया

माँ वह सच्ची , पथप्रदर्शक
जिसने मुझे हर राह बताई
जिसने मुझे हर युक्ति सुझाई

माँ वह सलाहकार ,
जिसने मुझे सच्चे दोस्त की तरह
हमेशा सच्ची तथा निःशुल्क सलाह देकर
जीवन के हर मोड़ पर जीवित रहने हेतु
सामर्थ्यता का वरदान दिया





शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

सरहद पैर

दो आतंकी ढेर
दो जवान शहीद
कुल मिला कर
चार घरों में अँधेरा
दो इधर
तो दो घर उधर
जरी है अभी सिलसिला
सरहदों पर
..आमीन..
प्रस्तुतकर्ता संजय भास्कर पर

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

डाकिया

तन पर झोला , मन है भोला
घूम रहा है गली - गली
आओ अपनी चिठ्ठी ले लो
हर द्वार-द्वार पुकार चली

मीठे -मीठे श्वर को सुनकर
मुरझाये चेहरे खिल जाते
यादों में है जिन्हें बसाया
पत्रों में आकर मिल जाते

वर्षा हो या जेष्ठ दुपहरी
तूफां हो या शीत हो गहरी
हर मौसम में नित-दिन आता
बन करके "हर दिल" का प्रहरी

सबसे उसका प्रेम का नाता
नित-दिन नयें संदेशे लाता
हर सुख-दुःख का वह भागी है
हर "दिल" उसका अनुरागी है

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

बाबा अम्बेडकर की जयंती पर नमन

***आज संविधान-निर्माता बाबा अम्बेडकर जी की जयंती पर शत-शत नमन ***

शुक्रवार, 26 मार्च 2010


शहीद दिवस के अवसर पर
विशेजिस पर अपना सर्वस्व लुटाया, जिसके खातिर प्राण दिए थे।
वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते॥
आँख सजल तुम्हारी होती, प्राणों में कटु विष घुल जाता।
पीड़ित जनता की दशा देखकर, ह्रदय विकल व्यथित हो जाता ॥
जहाँ देश के कर्णधार ही, लाशों पर रोटियाँ सेकते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
तुम जैसे वीर सपूतों ने, निज रक्त से जिसको सींचा था।
यह देश तुम्हारे लिए स्वर्ग से सुन्दर एक बगीचा था॥
अपनी आँखों के समक्ष, तुम कैसे जलता इसे देखते ।
वीर भगत सिंह आज अगर........
जिस स्वाधीन देश का तुमने, देखा था सुन्दर सपना।
फांसी के फंदे को चूमा था, करने को साकार कल्पना॥
उसी स्वतन्त्र देश के वासी, आज न्याय की भीख मांगते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
अपराधी, भ्रष्टों के आगे, असहाय दिख रहा न्यायतंत्र।
धनपशु, दबंगों के समक्ष, दम तोड़ रहा है लोकतंत्र।
जहाँ देश के रखवालों से, प्राण बचाते लोग घुमते॥
वीर भगत सिंह आज अगर........
साम्राज्यवाद का सिंहासन, भुजबल से तोड़ गिराया ठादेश के
नव युवकों को तुमने, मुक्ति मार्ग दिखाया था॥
जो दीप जलाये थे तुमने, अन्याय की आंधी से बुझते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
जिधर देखिये उधर आज, हिंसा अपहरण घोटाला है।
अन्याय से पीड़ित जनता, भ्रष्टाचार का बोल बाला है॥
लुट रही अस्मिता चौराहे पर, भीष्म पितामह खड़े देखते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
साम्राज्यवाद के प्रतिनिधि बनकर, देश लुटेरे लूट रहे।
बंधुता, एकता, देश प्रेम के बंधन दिन-दिन टूट रहे॥
जनता के सेवक जनता का ही, आज यहाँ पर रक्त चूसते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
बंधू! आज दुर्गन्ध आ रही, सत्ता के गलियारों से।
विधान सभाएं, संसद शोभित अपराधी हत्यारों से।
आज विदेशी नहीं, स्वदेशी ही जनता को यहाँ लूटते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
पूँजीपतियों नेताओं का अब, सत्ता में गठजोड़ यहाँ।
किसके साथ माफिया कितने, लगा हुआ है होड़ यहाँ ॥
अत्याचारी अन्यायी, निर्बल जनता की खाल नोचते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
शहरों, गाँवों की गलियों में, चीखें आज सुनाई देती।
अमिट लकीरें चिंता की, माथों पर साफ़ दिखाई देती॥
घुट-घुट कर मरती अबलाओं के, प्रतिदिन यहाँ चिता जलते।
वीर भगत सिंह आज अगर........
घायल राम, मूर्छित लक्ष्मण, रावण रण में हुंकार रहा।
कंस कृष्ण को, पांडवों को, दुःशासन ललकार रहा॥
जनरल डायर के वंशज, आतंक मचाते यहाँ घूमते।
वीर भगत सिंह आज अगर, उस देश की तुम दुर्दशा देखते॥

-मोहम्मद जमील शास्त्री( सलाहकार लोकसंघर्ष पत्रिका )शहीद दिवस के अवसर पर भगत सिंह, राजगुरु व सहदेव को लोकसंघर्ष परिवार का शत्-शत् नमन
Reactions:

सोमवार, 22 मार्च 2010


जिंदगी में सदा मुस्कुराते रहो

जिंदगी एक रात है ,
जिसमे न जाने कितने खवाब है
जो मिल गया वो अपना है ,
जो टूट गया वो सपना है
ये मत सोचो की जिंदगी में कितने पल है ,
ये सोचो की हर पल में कितनी जिंदगी है
तो हर पल जिंदगी हंस कर जियो ,
हर पल को जी भर के जियो
हस्ते रहो मुस्कुराते रहो
प्रस्तुतकर्ता संजय भास्कर पर

शनिवार, 20 मार्च 2010

गरीब की लड़की

सामाजिक दहलीज पर
अपने घर के कोने कि तरह
रह -रह कर ठिठक जाती है
अक गरीब की लड़की
उसी समाज में जहाँ
कम एवं छोटे वश्त्र पहनना
नित्य नया फैशन माना जाता है
वहीँ गरीब की लड़की
अपने फटे वस्त्रों में
अपनी लाज छुपाने के लिए
बार-बार सिमट जाती है
उसे महसूस होती है
उन निगाहों की चुभन
जो बेह्याही स झांकती हैं
सूछम छिद्रों स उसका तन
और वह पी जाती है पीड़ा
मसोस कर अपना मन

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित राज्यों का पुनर्गठन
भारत विविधताओं वाला देश है जहां विभिन्न धर्म, जाति भाषा एवं विचारधारा वाले लोग निवास करते हैं। इस प्रकार की विभिन्न विचारधारा वाले लोगों को एक साथ खड़ा करके भावी आदर्शों एवं मूल्यों पर एकमत करना एक कठिन कार्य ही नहीं अपितु असम्भव कार्य भी है। ऐसे माहौल में राज्यों का पुनर्गठन एक जटिल समस्या है। फिर भी कुछ प्रान्तों में तेलंगाना, हरित प्रदेश, बुन्देलखण्ड़, गोरखालैण्ड़ एवं विदर्भ इत्यादि के नामों से राज्यों के पुनर्गठन की मांग उठना विकास की किस उत्तरोत्तर प्रगति को प्रदशर््िात करता है? इस प्रश्न पर देश के कर्णधारों का मौन रूप स्वतः ही इसके जटिल परिणामों को प्रतिबिम्बित करता है। देश में पहली बार वर्ष 1956 में राज्यों का पुनर्गठन हुआ था तथा उक्त प्र्रक्रिया अनवरत चलती रही और भारत देश खण्ड़ो में बंटता चला गया। भारतीय संविधान के रचियता डाॅ0 भीमराव अम्बेड़कर ने वर्ष 1956 में प्रकाशित उनके एक निबन्ध ‘‘थाट्स आन लिग्विस्टिक स्टेट्स’’ में सशक्त एवं प्रभावशाली शासन को आधार बनाकर राज्यों के पुनर्गठन की युक्ति का सुझाव दिया था। इस निबन्ध में डाॅ0 भीमराव अम्बेड़कर ने दक्षिणी और उत्तरी राज्यों की क्षेत्रफलीय असमानता को दृष्टिगत रखते हुए छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना को मंजूरी दी थी। उदाहरणस्वरूप उन्होंने उत्तर प्रदेश को तीन बराबर-बराबर भागों जैसे मध्य उत्तर प्रदेश, पश्चिमी प्रदेश एवं पूर्वी प्रदेश के रूप में बांटने का प्रस्ताव किया। उक्त बँटवारे में उन्होंने आबादी और क्षे़त्रफल को पूरा महत्व दिया था । प्रस्तावित राज्यों के प्रमुख शहरों कानपुर, मेरठ और इलाहाबाद को राज्यों की राजधानी बनाने का भी सुझाव दिया था। किन्तु डाॅ0 भीमराव अम्बेड़कर के उक्त विचारों पर अमल करने के बजाय कुछ राज्यों के कर्णधारों ने तत्कालीन सरकार को भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन हेतु विवश कर दिया था। इस प्रकार की आवाजें अभी भी रह-रहकर उठती रहती हैं। दुर्भाग्यवश अब लगभग अर्धशतक के पश्चात कुछ राजनीतिक हस्तियों द्वारा निजी स्वार्थों से ओत प्रोत पूर्व में की गयी गलतियों को उदाहरण स्वरूप पस्तुत करके पुनः नये राज्यों के पुनर्गठन की मांग की जा रही है, जिसे कि उचित ठहराना वर्तमान परिस्थितियों में जायज नहीं लगता। तेलंगाना राज्य के अलगाव आन्दोलन के साथ ही कुछ अन्य छोटे राज्यों के पुनर्गठन की निरथर््ाक मागें भी बढ़ती जा रही हैं। ऐसी मांगें कई बार हिंसक रूप धारण कर लेती हैं, जो देश की एकता व अखण्डता तथा साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए घातक सिद्ध होती हंै। वोट बैंक एवं क्षेत्रवार की राजनीति के चलते राजनैतिक कर्णधार भी ऐसी बातों को हवा देते हैं जो कि देश के लिए घातक हैं। वस्तुतः हमारे देश के राष्ट्र निर्मताओं एवं सच्चे सपूतों ने भारत देश की उत्तरोत्तर प्रगति हेतु जो सकरात्मक कल्पना की थी उसमें भी लोकतन्त्र की नयी क्रान्ति के माध्यम से नये सशक्त समाज की स्थापना, राष्ट्र को अटल एवं मजबूत शक्ति के रूप में उभारना, राष्ट्र की एकता व अखड़ता तथा साम्प्रदायिक सद्भावना को अधिक से अधिक मजबूती प्रदानकरना एवं राष्ट्र की‘‘एकता, लोकतन्त्र और आर्थिक व सामाजिक आदर्शों के मूल्यों को बढ़ावा देना जैसे तत्व शामिल थे, किन्तु इसके विपरीत राज्यों का आधुनिक पुनर्गठन देश की ‘‘ एकता ,लोकतन्त्र और आर्थिक तथा सामाजिक आदर्शो’’ को आघात पहुँचाता है। इन तत्वों का सामूहिक एवं सशक्त संगम भारत को विकसित , सम्पन्न एवं समृद्ध देश की श्रेणी में स्थान दिलाता है। किन्तु राज्यों के पुनर्गठन की ऐसी घटनाओं को देखकर यह प्रतीत होता है कि देशों के कुछ कथित राजनेताओं ने अपनी राजनीतिक महत्वाकाक्षांओं की छद्म पूर्ति हेतु स्वतन्त्रता,समानता एवं आपसी भाईचारे की भावना के साथ-साथ आर्थिक राजनीतिक तथा सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों को तिलांजलि दे दी है। ऐसे में यह अति आवश्यक हो गया है कि राष्ट्र की एकता तथा अखण्ड़ता को सदैव स्थिर रखने के लिये आज की युवा पीढ़ी को भारतीय संविधान में निहित समस्त तत्वों की सम्यक जानकारी देनी चाहिए और उनके सुचारू रूप से अनुपालन करने तथा कराने का मौलिक दायित्व भी सौंपना चाहिए, आखिर वे ही राज्य के कर्णधार हैं।

मंगलवार, 12 जनवरी 2010

मंहगाई

मंहगाई की मार से
केन्द्र हुआ लाचार
झटपट काबू पाने के
होने लगे विचार
होने लगे विचार
खाद्यान आयात करेंगें
गेहूँ, चावल, दलहन से
भण्डार भरेंगें
निजी फ्लोर मिलों के द्वारा
करेंगें हम आयात
बहु भण्डार भरेंगें अपने
होगा राशन पर्याप्त
होगा राशन पर्याप्त
न कोई भूखा सोये
करें थोड़ा सा सहन
न कोई आपा खोये
मंहगाई की मार से
जन जीवन है त्रस्त
एयर कंडीशन बैठक में
सब मंत्री है मस्त
सब मंत्री हैं मस्त
‘रमई’ का छिना निवाला
मंहगाई की धुंध में
निकल गया है दिवाला
मंहगाई बढ़ती गयी,
कम न हुई मिलावट
कीमत चढ़ती ही गयी
मानक में हुई गिरावट

2

मानक में हुई गिरावट
सभी का सपना टूटा
सत्ता लोलुप लोगों ने
निर्धन को लूटा
कल्लू की पहँच से
अब बैंगन है दूर
जीवन जिनके बिन न चले
उनकी कीमत हमसे दूर
कल्लू ने है त्याग दिया
लेना बैंगन का भर्ता
लल्लू ने भी छोड़ दिया
अब पहनना कुर्ता
मंहगाई की मार से
निकला सबका तेल
नित्य नया हो रहा
मंहगाई का खेल !!

गुजरती Pidiyan

जाने क्यों लोग ऐसा करते हैं
जिनको कहते हैं अपना
नित्य प्रति उन्हीं को दुख पहुँचाते है
वे जानते है कि जो,
आज हुआ है प्रचलित
वही भविष्य के जगमगाहट में
हो जायेगे विस्मृत
फिर भी न जाने क्यों
दोहराते है इतिहास
और कल के आगोश में
बन जाते है परिहास
घोर आश्चर्य है कि
करते हैं उपेक्षा उनकी
मात्र दो रोटी और कुछ बुंदे
भूख-प्यास है जिनकी
जिन्होंने चार-पाँच को,
अकेले है पाला
वही उन्हे नही दे पा रहे है
मात्र दो कौर निवाला
अब तो वे न आ रहे
है ‘‘बूँदो’’ के काम
जिनके लालन-पालन में
नहीं किया विश्राम
यहाँ सभी को याद है
‘‘श्री गीता’’ का ज्ञान
कर्मो के आधार पर
फल देता भगवान
फिर भी इस संदेश को
है जाते वे भूल

सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

ताश का नशा

ताश का नशा

पत्ता फेंटत कर घिसा मिला न धन का ढेर ,

अबकी आए "लोभ" में बैठे रहे मुडेर ।

बैठे रहे मुडेर नही कुछ खाना पीना ,

चाहे छूटे घरद्वार चाहे रूठे "मीना "।

अपना ही हित सोंच लगायें नित नित बाजी,

चटखारे ले-लेकर करें हर बाजी ताजी।

खेलत - खेलत यदि कोई आ जाता व्यवधान ,

"Bharti " एक साथ मिल हो जाते "कर -चितवन" संधान ।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

"गाँधी जी बने प्रेरक व्यक्तित्व वाले विश्व नायक "

  • आज
  • जहाँ भारतीय डाक विभाग विश्व डाक दिवस मना रहा है वहीं डाक विभाग ने गाँधी जी पर डाक टिकट छाप कर उन्हे प्रेरक व्यक्तित्व वाला विश्व नायक बना दिया है । डाक विभाग गाँधी जी पर इस समय एक निबंध प्रतियोगिता आयोजित कर रहा है जिसमे कक्षा ३, ५ तथा ६ से ८ तक के विद्यार्थी भाग ले सकते हैं । सर्वोच्च निबंध लेखन के लिए डाक विभाग पुरुष्कार वितरित कर विजेता को प्रोत्साहित भी करेगा ।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

राह उड़ती धूल ने तुझको पुकारा '
और बहती पवन ने "दामन" संवारा !
मुस्कराते "चाँद" ने भी चाँदनी दी '
और "रजनी" तेरे ही आगोश में थी !
डगमगाते पग भी जब संवर न पायें '
तो बताओ राह चलकर क्या करोगे !

जिंदगी कि लहर में न टिक सके तो '
मौत कि पगडंडियों में भटकते रहोगे !
कदम क्योँ बढाते हो नजरें झुकाकर '
हो क्यों भागते दुःख से दामन छुडाकर !
झंझावतों से जो टकरा न पाए '
तो अंध-कन्दराऔ में भटकते रहोगे !