कटघरे में खड़ा मीडिया
जो है चैथा स्तम्भ
हम हिन्दुस्तानी होने का
फिर भी भरते ‘दम्भ’
फिर भी भरते ‘दम्भ’
निज ढ़पली ही रहे बजाते
नाकामी, भ्रस्टाचारों से
निषदिन देष को रहे सजाते
निषदिन देष को रहे सजाते
मंहगाई औ घोटालों से
जनता का पैसा रहे लूटते
मंचों औ चैपालों से
राज काज भी हुआ स्वार्थी
मरती जनता भूखी
सत्ता लोलुप नभ में घूमें
कुछ लोग न पायें सूखी
कुछ लोग न पायें सूखी
नही उनके सिर छत है
मुक्त कराया देष आज
सैनानी आहत हैं ।
सैनानी आहत हैं,
फैली चारों ओर उदासी
मीडिया और प्रषासन
बन गया नेताओं की दासी
नीट संकट और परीक्षा-व्यवस्था की विश्वसनीयता
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भारत की प्रतियोगी परीक्षा-व्यवस्था केवल प्रवेश की प्रक्रिया नहीं, बल्कि
सामाजिक न्याय, अवसर और प्रतिभा-परीक्षण का आधार है। जब राष्ट्रीय पात्रता सह
प्रवेश...
1 हफ़्ते पहले

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