चली चर्चा एक बार कवित्व पर
कि ‘कविता क्या होती है?
किसी ने कहा कि
‘कविता’ कवि का भाव है
‘कवि के विचारों का
क्रमात्मक बहाव है’
किसी ने सराहा कि
‘कवि अपने दर्द को
कागज पर उकेरता है’
अपने खुशी भरें पलो को
अंलकारों और रसों से संवार कर
लेखनी की उन्मत् चाल से
शब्दों को वाक्यों में पिरोकर
कागज पर सहेजता है
वह जो समाज में देखता है
उसे ही ढ़ालकर आइने में
समाज को आईना दिखाता है
कवि अपने कल्पना रूपी पंखो से
लेखनी की थिरकन पर
वहाँ पहुँच जाता है
नीट संकट और परीक्षा-व्यवस्था की विश्वसनीयता
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भारत की प्रतियोगी परीक्षा-व्यवस्था केवल प्रवेश की प्रक्रिया नहीं, बल्कि
सामाजिक न्याय, अवसर और प्रतिभा-परीक्षण का आधार है। जब राष्ट्रीय पात्रता सह
प्रवेश...
1 हफ़्ते पहले

3 टिप्पणियां:
..बहुत सुन्दर परिभाषित किया है आपने कवित्व को....आर सारांश में ये पक्तियों बेहद अच्छी लगी....
वह जो समाज में देखता है
उसे ही ढ़ालकर आइने में
समाज को आईना दिखाता है
कवि अपने कल्पना रूपी पंखो से
लेखनी की थिरकन पर
वहाँ पहुँच जाता है
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