06 December, 2010
सिकंदर को कौन समझाए !!!
- रश्मि प्रभा...
कोई मानना नहीं चाहता
सही शब्दों में कहें
तो स्वीकार करना नहीं चाहता
कि जिस धरती पर खून खराबे हुए
जहाँ अपमान के शूल बिछाए गए
वहाँ कोई घर बन सकता है
और वहाँ की दीवारें गा सकती हैं !....
अपने 'स्व' की मद में डूबा इन्सान
सूक्तियां बोलता है
रुपयों के बल पर
सिकंदर बनता है
पर एक टूटी झोपड़ी
महल के अस्तित्व को फीका कर जाये
बर्दाश्त नहीं कर पाता है
हर मोड़ पर झोपड़ी की रोटी का सोंधापन
प्रतिस्पर्धा का सबब बन जाता है
....
दुखद तो है
पर कड़वा सत्य है
महल के हर कदम
फैसले की मुहर लिए बढ़ते हैं
'झोपड़ी को तोड़ दिया जाये' !
जब जब यह फैसला होता है
उस दिन झोपड़ी की दीवारें नहीं गातीं
....
और भगवान् -
जी जान से नई धुन बनाता है
दीवारों को जिंदा करने के लिए
खुद गाता है
....
अब यह सिकंदर को कौन समझाए !!!
वित्तीय समावेशन, डिजिटल नवाचार से ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स तक, भारतीय डाक सुदूर
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-
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अग्र...
13 घंटे पहले

