सामाजिक दहलीज पर
अपने घर के कोने कि तरह
रह -रह कर ठिठक जाती है
अक गरीब की लड़की
उसी समाज में जहाँ
कम एवं छोटे वश्त्र पहनना
नित्य नया फैशन माना जाता है
वहीँ गरीब की लड़की
अपने फटे वस्त्रों में
अपनी लाज छुपाने के लिए
बार-बार सिमट जाती है
उसे महसूस होती है
उन निगाहों की चुभन
जो बेह्याही स झांकती हैं
सूछम छिद्रों स उसका तन
और वह पी जाती है पीड़ा
मसोस कर अपना मन
शनिवार, 20 मार्च 2010
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3 टिप्पणियां:
सामाजिक दहलीज पर
अपने घर के कोने कि तरह
रह -रह कर ठिठक जाती है
अक गरीब की लड़की
उसी समाज में जहाँ
कम एवं छोटे वश्त्र पहनना
man choo lene wali rachna
उसे महसूस होती है
उन निगाहों की चुभन
जो बेह्याही स झांकती हैं
सूछम छिद्रों स उसका तन
और वह पी जाती है पीड़ा
मसोस कर अपना मन
dil ko gaharayee tak choo gayee apkee panktiyan.shubhakamnayen.
BHARTI SAHAB NAMASKAR SIR..
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